Monday, November 11

Insaan ki Aukaat

God in his Creations' Court !!

Saturday, November 2

Democracy and Wet Hair Woman

*औरत के गीले बाल और लोकतंत्र...*

पॉलिटिकल साइंस के सेमिनार में एक विद्यार्थी का बयान था कि मेरा तो यक़ीन लोकतंत्र पर से सन 1996 में ही उठ गया था..

कहने लगा कि ये उन दिनों की बात है जब एक शनिवार को मैं मेरे बाक़ी तीनों बहन भाई, मम्मी पापा के साथ मिलकर रात का खाना खा रहे थे ।
 पापा ने पूछा:- *कल तुम्हारे चाचा के घर चलें या मामा के घर?*
हम सब भाइयों बहनों ने मिलकर बहुत शोर मचा कर चाचा के घर जाने को कहा, सिवाय मम्मी के जिनकी राय थी 
*कि मामा के घर जाया जाए।*

*बात बहुमत की मांग की थी और अधिक मत चाचा के खेमे में पड़े थे ...*
बहुमत की मांग के मुताबिक़ तय हुआ 
*कि चाचा के घर जाना है।*
 मम्मी हार गईं। पापा ने हमारे मत का आदर करते हुए चाचा के घर जाने का फैसला सुना दिया।
 हम सब भाई बहन चाचा के घर जाने की ख़ुशी में जा कर सो गये।
रविवार की सुबह उठे तो मम्मी गीले बालों को तौलिए से झाड़ते हुए बमुश्किल अपनी हंसी दबा रहीं थीं..
*उन्होंने हमसे कहा के सब लोग जल्दी से कपड़े बदल लो हम लोग मामा के घर जा रहें हैं।*
मैंने पापा की तरफ देखा जो ख़ामोशी और तवज्जो से अख़बार पढ़ने की एक्टिंग कर रहे थे.. मैं मुंह ताकता रह गया..
*बस जी!*
*मैंने तो उसी दिन से जान लिया है कि* लोकतंत्र में बहुमत की राय का आदर... और वोट को इज़्ज़त...  सब  ढकोसले है।
*असल फैसला तो बन्द कमरे में उस वक़्त होता है जब ग़रीब जनता सो रही होती है"*

😜😆😆😆😆

इसके बाद उस विद्यार्थी ने पोलिटिकल साइंस छोड़कर इकोनॉमिक्स ले ली।.   😂

Friday, November 1

Ramayan

रामायण में भोग नहीं त्याग है।

भरत जी तो नंदिग्राम में रहते हैं, शत्रुघ्न जी  उनके आदेश से राज्य संचालन करते हैं

एक एक दिन रात करते करते, भगवान को वनवास हुए तेरह वर्ष बीत गए ।

एक रात की बात हैं,माता कौशिल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी । नींद खुल गई । पूछा कौन हैं ?

मालूम पड़ा श्रुतिकीर्ति जी हैं । नीचे बुलाया गया ।

श्रुतिकीर्ति जी, जो सबसे छोटी हैं, आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं ।

माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बिटिया ? क्या नींद नहीं आ रही ? शत्रुघ्न कहाँ है ?

श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी, गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए ।

उफ ! कौशल्या जी का कलेजा काँप गया ।

तुरंत आवाज लगी, सेवक दौड़े आए । आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी, माँ चली ।

आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ?

अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले।

माँ सिराहने बैठ गईं, बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी ने आँखें खोलीं, माँ!

उठे, चरणों में गिरे, माँ ! आपने क्यों कष्ट किया ? मुझे बुलवा लिया होता।

माँ ने कहा, शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?"

शत्रुघ्न जी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैय्या राम जी  पिताजी की आज्ञा से वन चले गए, भैय्या लक्ष्मण जी उनके पीछे चले गए, भैय्या भरत जी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं ?

माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं ।

देखो यह रामकथा हैं...

यह भोग की नहीं त्याग की कथा हैं, यहाँ त्याग की प्रतियोगिता चल रही हैं और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा।

चारो भाइयों का प्रेम और त्याग  एक दूसरे के प्रति अद्भुत-अभिनव और अलौकिक हैं ।

जय सियाराम
रामायण जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं।
सियावर रामचन्द्र की जय 🏹